
महासमुंद/सरायपाली : छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में अनुशासन और सरकारी निर्देशों की धज्जियां उड़ाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। सरायपाली विकासखंड के ग्राम तोरसिंहा स्थित शासकीय कन्या उच्च प्राथमिक शाला में प्रभारी प्रधानपाठक ओमप्रकाश छत्रपति द्वारा पद का दुरुपयोग करते हुए शासन द्वारा निर्धारित स्कूल के समय में भारी फेरबदल कर दिया गया है। जहाँ पूरे प्रदेश में स्कूल सुबह 10:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक संचालित हो रहे हैं, वहीं तोरसिंहा में प्रधानपाठक ने अपनी सहूलियत के अनुसार स्कूल को सुबह 7:00 बजे से 11:00 बजे तक कर दिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रभारी प्रधानपाठक ने विभाग से किसी भी प्रकार की अनुमति लिए बिना, अपनी मर्जी को कानूनी जामा पहनाने के लिए शाला प्रबंधन एवं विकास समिति (SMDC) का सहारा लिया। आरोप है कि उन्होंने गांव के भोले-भाले ग्रामीणों और समिति के सदस्यों को आड़ बनाकर एक प्रस्ताव पारित करवाया। इस प्रस्ताव के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की गई कि समय का परिवर्तन जनहित में और ग्रामीणों की सहमति से है।
शिक्षाविदों और विभागीय जानकारों का कहना है कि शाला प्रबंधन समिति को स्कूल के रखरखाव और विकास कार्यों की देखरेख का अधिकार तो है, लेकिन उन्हें राज्य शासन द्वारा निर्धारित शैक्षणिक समय सारणी (School Calendar) को बदलने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
नियमों के अनुसार, उच्च प्राथमिक स्तर पर बच्चों के लिए निर्धारित शैक्षणिक घंटों का पालन अनिवार्य है ताकि पाठ्यक्रम समय पर पूरा हो सके। सुबह 7:00 से 11:00 बजे तक (मात्र 4 घंटे) स्कूल संचालित करने से भोजन अवकाश और अन्य गतिविधियों के बाद पढ़ाई के लिए बहुत कम समय बचता है। इससे छात्राओं की शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा प्रहार हो रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या केवल 4 घंटे की पढ़ाई में शासन के “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा” के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है?
प्रधानपाठक ने ग्रामीणों को समय बदलने के पीछे शाला परिसर में स्थित ग्राउंड में आयोजित क्रिकेट प्रतियोगिता का आड़ लिया, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह बदलाव शिक्षकों की अपनी व्यक्तिगत सुविधा के लिए किया गया प्रतीत होता है। सुबह जल्दी स्कूल लगाकर दोपहर से पहले छुट्टी कर लेने से शिक्षकों को निजी कार्यों के लिए अतिरिक्त समय मिल जाता है, जबकि इसका खामियाजा उन छात्राओं को भुगतना पड़ रहा है जो सुबह-सुबह दूर-दराज से स्कूल पहुँचती हैं।
यह मामला न केवल एक प्रधानपाठक की मनमानी को दर्शाता है, बल्कि विकासखंड शिक्षा कार्यालय (BEO) और जिला शिक्षा कार्यालय (DEO) की निगरानी तंत्र पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
1. क्या सरायपाली विकासखंड के अधिकारियों को इस बात की खबर नहीं है कि एक स्कूल पिछले कुछ दिनों से निर्धारित समय के विपरीत चल रहा है?
2. क्या किसी भी शिक्षक या प्रधानपाठक को यह अधिकार है कि वह शासन के राजपत्र और आदेशों को दरकिनार कर अपनी स्थानीय ‘संसद’ चलाए?
3. यदि भविष्य में अन्य स्कूलों के प्रधानपाठक भी इसी तरह प्रस्ताव बनाकर समय बदल लें, तो क्या शिक्षा विभाग की व्यवस्था चरमरा नहीं जाएगी?
सरायपाली के सजग नागरिकों और शिक्षा प्रेमियों ने इस मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से करने की तैयारी कर ली है। उनकी मांग है कि प्रभारी प्रधानपाठक ओमप्रकाश छत्रपति पर विभागीय नियमों के उल्लंघन के लिए कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और स्कूल को तत्काल प्रभाव से शासन द्वारा निर्धारित समय (सुबह 10 से शाम 4) पर संचालित किया जाए।
जब इस संबंध में संकुल संकुल प्राचार्य, संकुल समन्वयक, ग्राम सरपंच एवं सचिव से जानकारी मांगी गई तो उन्होंने संबंधित मामले में अभिज्ञता जाहिर करते हुए, इस संबंध में किसी भी प्रकार का आदेश या प्रस्ताव नहीं करने की बात कही।
इस मामले में जब तक विभाग कड़ा रुख नहीं अपनाता, तब तक नियमों की इस तरह की बलि दी जाती रहेगी। अब देखना यह है कि महासमुंद जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस “स्वयंभू” व्यवस्था पर क्या एक्शन लेता है।




