

रायपुर: पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ. ग.) के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य अध्ययनशाला में दिनांक 19 से 22 नवम्बर 2024 तक प्रोफेसर ऑफ प्रेक्टिस पद्मश्री जागेश्वर यादव जी के चार दिवसीय विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया है। जिसके अंतर्गत आज तृतीय दिवस में बिरहोर जनजाति का जीवन शैली पूर्व एवं वर्तमान विषय में व्याख्यान दिया गया । जिसमें श्री यादव जी ने बताया यह बिरहोर जनजाति विशेष पिछड़ी जनजाति है जो आज भी जंगलों एवं पहाड़ों में रहना पसंद करती है पूर्व में की स्थिति अत्यंत दयनीय थी क्योंकि इनके जीवन यापन का साधन केवल आखेट था किंतु वर्तमान में ये कृषि ,पशुपालन , लकड़ी बेचने, रस्सी बनाने , दोना पत्तल निर्माण जैसे कार्यों को करने लगे हैं , जिससे उनके जीवन शैली में पूर्व की अपेक्षा वर्तमान में अनेक सुधार हुए हैं । पूर्व में उनके आवास कच्चे थे जो केवल लकड़ी एवं पत्तों के बने होते थे किंतु वर्तमान में प्रधानमंत्री आवास योजनाओं जैसी सुविधाओं के कारण इनके पास पक्के आवास है । वर्तमान में शासन द्वारा इन्हें कृषि एवं पशुपालन जैसे व्यवसायों से जोड़ने के लिए अनेक प्रयास किया जा रहे हैं। बिरहोर जनजाति के लोग जंगल में रहना पसंद करते हैं इसीलिए यह जंगल से संबंधित कार्य करते हैं। इनके जीवन में जंगल का बहुत महत्व है। क्योंकि सभी प्रकार की उनकी जीविका उनका खाना पीना सब वहीं से आता है, उनका यह मानना है कि जंगल उन्हें सब प्रकार की जड़ी बूटी सभी प्रकार का खाद्य पदार्थ उनके जीवन जीने के लिए सामान सब वहीं से आता है इसलिए उनके लिए जंगल बहुत महत्वपूर्ण रहता है, बिरहोर जनजाति जंगल को हर तरह से बचाने का प्रयास करता है।
यह कार्यक्रम कुलपति प्रो. सच्चिदानंद शुक्ल जी के मार्गदर्शन में आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रो. निस्तर कुजूर, वरिष्ठ एसोसिएट प्रोफेसर डॉ हेमलता बोरकर वासनिक, अतिथि प्राध्यापक डॉ. ममता सिरमोर वर्मा, सुश्री हुमप्रभा साहू, श्री फलेंद्र कुमार तथा विभाग के बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान छात्र-छात्राएं में उत्सुकता और जागरूकता का वातावरप्रोफेसरण बना रहा, और सभी ने व्याख्यान के अंत में पद्मश्री यादव जी के कार्यों और विचारों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। यह व्याख्यान बिरहोर जनजाति की समस्याओं की गहराई को समझने और उनके समाधान के प्रति सरकार और समाज के स्तर पर जागरूकता बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।




